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Monday, October 10, 2011

सच्चाई

टूट के बिखरता हूँ तो ईस बात का एहसास होता है, ज़िन्दगी इतनी तकलीफ देती हैं तो, मौत का आलम क्या होगा.......... हिना के वास्ते जब सखियाँ उसके हाथ खोलेंगी , तो पहली बार वो सच्ची लकीरें झूठ बोलेंगी....... तमन्ना गर "अंश -ए-वजूद "की होती,तो ज़माने से छिन लेता...... इश्क तेरी रूह से है, इस लिए खुदा से माँगता हूँ....... शरीक न होना ए दोस्तों मेरे जनाज़े में , इन तन्हाइयों के खौफ से गर मैं मरू तो... --------------------------------------------- रश्मिराज़ कौशिक विक्की .

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