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Monday, October 10, 2011

khwaahishen teri ......

ख्वाहिशों के आँगन में रात दिन बसेरे थे, तितलियाँ तुम्हारी और फूल मेरे थे, चाँद आसमान से जब धरती पर उतरा था, देखने में रात ,पर सवेरे थे, तेरे पास बसने की कसम खायी है लेकिन, शहर भी पराया ,लोग भी लूतारय थे, लुट गए हम तो कसूर किस का हैं, ख्वाहिशें भी तेरी,फासले भी तेरे थे.....---- ---------------------------------------------- रश्मिराज़ कौशिक विक्की .

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