मर जाना हैं .......................
घर से ये सोच के निकला कि मर जाना हैं, अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना हैं.... जिस्म से साथ निभाने कि मत उम्मीद रखो, इस मुसाफिरज को तो रास्ते में ही ठहर जाना हैं मौत लम्हों कि सदा, ज़िन्दगी उम्रो कि पुकार, मैं यह सोच कर जिंदा हूँ कि मर जाना हैं, नशा ऐसा था कि मैखाने को ही दुनिया समझ बैठा, होश आया तो ख्याल आया कि घर जाना हैं, मेरे जज्बे कि बड़ी कदर हैं लोगो में मगर. मेरे जजबो को भी ऐ दोस्तों "कौशिक" के साथ ही मर जाना हैं......... --------------------------------------------- रश्मिराज़ कौशिक विक्की .

0 Comments:
Post a Comment
<< Home