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Monday, October 10, 2011

रुकना नहीं कहता है पल

पल पल हर पल कहता है ये पल . रुकना जिन्दगी नहीं , आ मेरे साथ चल. हाथ मेरे थाम ले तू ,जायेगा किस्मत बदल. पल पल हर पल कहता है ये पल . रोज बदल्ती दुनिया में ,कौन जाने क्या होगा कल. दुनिया की इस भरी मेहफिल में , तेरा भी है कुछ रोल. पल पल हर पल कहता है ये पल . छुटे जो साथ मेरा तो,रह जायोगे हाथ मल्. पल पल हर पल कहता है ये पल . रुकना नहीं कौशिक , आ मेरे साथ चल. ---------------------------------------------- रश्मिराज़ कौशिक विक्की .

मर जाना हैं .......................

घर से ये सोच के निकला कि मर जाना हैं, अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना हैं.... जिस्म से साथ निभाने कि मत उम्मीद रखो, इस मुसाफिरज को तो रास्ते में ही ठहर जाना हैं मौत लम्हों कि सदा, ज़िन्दगी उम्रो कि पुकार, मैं यह सोच कर जिंदा हूँ कि मर जाना हैं, नशा ऐसा था कि मैखाने को ही दुनिया समझ बैठा, होश आया तो ख्याल आया कि घर जाना हैं, मेरे जज्बे कि बड़ी कदर हैं लोगो में मगर. मेरे जजबो को भी ऐ दोस्तों "कौशिक" के साथ ही मर जाना हैं......... --------------------------------------------- रश्मिराज़ कौशिक विक्की .

सच्चाई

टूट के बिखरता हूँ तो ईस बात का एहसास होता है, ज़िन्दगी इतनी तकलीफ देती हैं तो, मौत का आलम क्या होगा.......... हिना के वास्ते जब सखियाँ उसके हाथ खोलेंगी , तो पहली बार वो सच्ची लकीरें झूठ बोलेंगी....... तमन्ना गर "अंश -ए-वजूद "की होती,तो ज़माने से छिन लेता...... इश्क तेरी रूह से है, इस लिए खुदा से माँगता हूँ....... शरीक न होना ए दोस्तों मेरे जनाज़े में , इन तन्हाइयों के खौफ से गर मैं मरू तो... --------------------------------------------- रश्मिराज़ कौशिक विक्की .

khwaahishen teri ......

ख्वाहिशों के आँगन में रात दिन बसेरे थे, तितलियाँ तुम्हारी और फूल मेरे थे, चाँद आसमान से जब धरती पर उतरा था, देखने में रात ,पर सवेरे थे, तेरे पास बसने की कसम खायी है लेकिन, शहर भी पराया ,लोग भी लूतारय थे, लुट गए हम तो कसूर किस का हैं, ख्वाहिशें भी तेरी,फासले भी तेरे थे.....---- ---------------------------------------------- रश्मिराज़ कौशिक विक्की .

waapas aa gaya ae "kafir kaushik",,unke uksaawe par

टूट के बिखरता हूँ तो ईस बात का एहसास होता है, ज़िन्दगी इतनी तकलीफ देती हैं तो, मौत का आलम क्या होगा..........